वट सावित्री यह व्रत ज्येष्ठ मास की अमावस्या तिथि के दिन मनाया जाता है

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सौभाग्य और संतान प्राप्ति की पूरी त्रिदिनात्मकं वटसावित्री व्रतारम्भ:स्तुतः इस वर्ष अमावस्या तिथि 19 मई शुक्रवार को मनाया जाएगा वटसावित्री व्रत।भविष्य पुराण के अनुसार वट सावित्री के दिन सावित्री ने यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राणों की रक्षा की थी।

सावित्री से प्रसन्न होकर यमराज ने चने के रूप में सत्यवान के प्राण सौंपे थे।चने लेकर सावित्री सत्यवान के शव के पास आई और सत्यवान में प्राण फूंक दिए। इस तरह सत्यवान जीवित हो गए।तभी से वट सावित्री के पूजन में चना पूजन का नियम है।वट वृक्ष को दूध और जल से सींचना चाहिए।इस दिन चने बिना चबाए सीधे निगले जाते हैं।उक्त बातें आयुष्मान ज्योतिष परामर्श सेवा केन्द्र के संस्थापक साहित्याचार्य ज्योतिर्विद आचार्य चन्दन तिवारी के ने बताया कि वट सावित्री व्रत के दिन दैनिक कार्य कर घर को गंगाजल से पवित्र करना चाहिए।इसके बाद बांस की टोकरी में सप्त धान्य भरकर ब्रह्माजी की प्रतिमा स्थापित करनी चाहिए।ब्रह्माजी के बाईं ओर सावित्री तथा दूसरी ओर सत्यवान की मूर्ति स्थापित करनी चाहिए।इसके बाद टोकरी को वट वृक्ष के नीचे ले जाकर रख देना चाहिए।इसके पश्चात सावित्री व सत्यवान का पूजन कर, वट वृक्ष की जड़ में जल अर्पण करना चाहिए।पूजन के समय जल, मौली, रोली, सूत, धूप, चने का इस्तेमाल करना चाहिए।सूत के धागे को वट वृक्ष पर लपेटकर सात बार परिक्रमा कर सावित्री व सत्यवान की कथा सुनना चाहिए।

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वट सावित्रि व्रत कथा :-
वट सावित्रि व्रत कथा के अनुसार एक समय की बात है कि मद्रदेश में अश्वपति नाम के धर्मात्मा राजा का राज था।उनकी कोई भी संतान नहीं थी।राजा ने संतान हेतु यज्ञ करवाया।कुछ समय बाद उन्हें एक कन्या की प्राप्ति हुई जिसका नाम उन्होंने सावित्री रखा। विवाह योग्य होने पर सावित्री के लिए द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान को पतिरूप में वरण किया।सत्यवान वैसे तो राजा का पुत्र था लेकिन उनका राज-पाट छिन गया था, और अब वह बहुत ही द्ररिद्रता का जीवन जी रहे थे। उसके माता-पिता की भी आंखो की रोशनी चली गई थी।सत्यवान जंगल से लकड़ियां काटकर लाता और उन्हें बेचकर जैसे-तैसे अपना गुजारा कर रहा था।जब सावित्रि और सत्यवान के विवाह की बात चली तो नारद मुनि ने सावित्रि के पिता राजा अश्वपति को बताया कि सत्यवान अल्पायु हैं, और विवाह के एक वर्ष बाद ही उनकी मृत्यु हो जाएगी ।
हालांकि राजा अश्वपति सत्यवान की गरीबी को देखकर पहले ही चिंतित थे, और सावित्रि को समझाने की कोशिश में लगे थे। नारद की बात ने उन्हें और चिंता में डाल दिया, लेकिन सावित्रि ने एक न सुनी और अपने निर्णय पर अडिग रही ।
अंततः सावित्री और सत्यवान का विवाह हो गया।
सावित्री सास-ससुर और पति की सेवा में लगी रही।
नारद मुनि ने सत्यवान की मृत्यु का जो दिन बताया था, उसी दिन सावित्री भी सत्यवान के साथ वन को चली गई।
वन में सत्यवान लकड़ी काटने के लिए जैसे ही पेड़ पर चढ़ने लगा, उसके सिर में असहनीय पीड़ा होने लगी और वह सावित्री की गोद में सिर रखकर लेट गया।
कुछ देर बाद उनके समक्ष अनेक दूतों के साथ स्वयं यमराज खड़े हुए थे।जब यमराज सत्यवान के जीवात्मा को लेकर दक्षिण दिशा की ओर चलने लगे, पतिव्रता सावित्री भी उनके पीछे चलने लगी।आगे जाकर यमराज ने सावित्री से कहा, ‘हे पतिव्रता नारी, जहां तक मनुष्य साथ दे सकता है, तुमने अपने पति का साथ दे दिया,अब तुम लौट जाओ, इस पर सावित्री ने कहा, ‘जहां तक मेरे पति जाएंगे, वहां तक मुझे जाना चाहिए यही सनातन सत्य है।’ यमराज सावित्री की वाणी सुनकर प्रसन्न हुए और उसे वर मांगने को कहा।सावित्री ने कहा, ‘मेरे सास-ससुर अंधे हैं, उन्हें नेत्र-ज्योति दें ।यमराज ने ‘तथास्तु’ कहकर उसे लौट जाने को कहा और आगे बढ़ने लगे ।
किंतु सावित्री यम के पीछे ही चलती रही। यमराज ने प्रसन्न होकर पुन: वर मांगने को कहा,सावित्री ने वर मांगा, ‘मेरे ससुर का खोया हुआ राज्य उन्हें वापस मिल जाए।’ यमराज ने ‘तथास्तु’ कहकर पुनः उसे लौट जाने को कहा,।परंतु सावित्री अपनी बात पर अटल रही और वापस नहीं गयी।सावित्री की पति भक्ति देखकर यमराज पिघल गए और उन्होंने सावित्री से एक और वर मांगने के लिए कहा, तब सावित्री ने वर मांगा, ‘मैं सत्यवान के सौ पुत्रों की मां बनना चाहती हूं।कृपा कर आप मुझे यह वरदान दें।’सावित्री की पति-भक्ति से प्रसन्न हो इस अंतिम वरदान को देते हुए यमराज ने सत्यवान की जीवात्मा को पाश से मुक्त कर दिया और अदृश्य हो गए।
सावित्री जब उसी वट वृक्ष के पास आई तो उसने पाया कि वट वृक्ष के नीचे पड़े सत्यवान के मृत शरीर में जीव का संचार हो रहा है।कुछ देर में सत्यवान उठकर बैठ गया।उधर सत्यवान के माता-पिता की आंखें भी ठीक हो गईं और उनका खोया हुआ राज्य भी वापस मिल गया।

यह पर्व हर परिस्थिति में अपने जीवनसाथी का साथ देने का संदेश देता है।इससे ज्ञात होता है कि पतिव्रता स्त्री में इतनी ताकत होती है कि वह यमराज से भी अपने पति के प्राण वापस ला सकती है। वहीं सास-ससुर की सेवा और पत्नी धर्म की सीख भी इस पर्व से मिलती है।
मान्यता है कि इस दिन सौभाग्यवती स्त्रियां अपने पति की लंबी आयु, स्वास्थ्य और उन्नति और संतान प्राप्ति के लिये यह व्रत रखती हैं।

r7bharat / अनुमण्डल ब्यूरो नीरज मिश्र