दीपावली की रोशनी के पीछे कुम्हारों का संघर्ष, मिट्टी के दीये बनाने में जुटे परिवारों की बढ़ी मेहनत

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नवंबर का महीना आते ही दीपावली की आहट महसूस होने लगी है। बाजारों में रौनक बढ़ गई है और दुकानों पर खरीदारी के लिए लोगों की भीड़ उमड़ रही है। कोई नए कपड़े खरीद रहा है तो कोई बर्तन, गहने और घर सजाने का सामान। रंग-बिरंगी लाइटों और सजावटी सामान से बाजार जगमगा रहे हैं। लेकिन इस चकाचौंध के बीच शहर और गांवों के उन कुम्हार परिवारों की मेहनत भी जारी है, जिनके हाथों से तैयार मिट्टी के दीये दीपावली की रात लोगों के घरों को रोशन करेंगे।

                    कुम्हार के द्वारा बने हुए दिए (R7 भारत)

कहीं कुम्हार चाक पर मिट्टी को आकार देकर दीये तैयार कर रहे हैं, तो कहीं तैयार दीयों को धूप में सुखाया जा रहा है। इसके बाद उन्हें भट्ठी में पकाने की तैयारी चल रही है। दीपावली का त्योहार नजदीक आते ही इन परिवारों की व्यस्तता कई गुना बढ़ गई है। सुबह से लेकर देर शाम तक चाक घूम रहा है और मिट्टी के छोटे-छोटे दीये आकार ले रहे हैं।

मिट्टी से दीये तक का सफर आसान नहीं

मिट्टी के दीये देखने में भले ही छोटे और साधारण नजर आते हों, लेकिन इन्हें तैयार करने में कुम्हार परिवारों को काफी मेहनत करनी पड़ती है। मिट्टी जुटाने से लेकर उसे तैयार करने, चाक पर दीये बनाने, सुखाने और फिर आग में पकाने तक कई चरणों से गुजरना पड़ता है। इस पूरी प्रक्रिया में समय के साथ खर्च भी लगातार बढ़ रहा है।

कुम्हारों का कहना है कि मिट्टी, जलावन और दीये पकाने में इस्तेमाल होने वाले ईंधन की लागत पहले की तुलना में बढ़ गई है। इसके अलावा मेहनत और परिवहन का खर्च भी बढ़ा है। लेकिन तैयार दीयों की कीमत बढ़ाना उनके लिए आसान नहीं है।

कीमत बढ़ाएं तो ग्राहक छूटने का डर

कुम्हार परिवारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती बाजार की बदलती पसंद और सस्ते विकल्प हैं। आज बाजार में इलेक्ट्रॉनिक लाइट, झालर और तरह-तरह के सजावटी सामान आसानी से उपलब्ध हैं। ऐसे में ग्राहक कीमत को लेकर काफी सतर्क रहते हैं। कुम्हारों को डर रहता है कि अगर मिट्टी के दीयों की कीमत बढ़ाई गई तो ग्राहक दूसरे विकल्पों की ओर चले जाएंगे।

यही वजह है कि लागत बढ़ने के बावजूद कई कुम्हार पुराने दामों के आसपास ही दीये बेचने को मजबूर हैं। नतीजा यह है कि मेहनत अधिक हो रही है, लेकिन मुनाफा अपेक्षाकृत कम रह जा रहा है।

         मोटर युक्त चक्र से दीए बनाते  कुम्हार   (R7 भारत) 

त्योहार की खुशियों के बीच आर्थिक चिंता

दीपावली पर जब हर घर रोशनी से जगमगाता है, तब उस रोशनी के पीछे कुम्हार परिवारों की मेहनत छिपी होती है। वे अपने हाथों से हजारों दीये तैयार करते हैं, ताकि लोग अपने घरों और आंगन को दीपों से सजा सकें। लेकिन इन परिवारों के अपने जीवन में आर्थिक चुनौतियां कम होने का नाम नहीं ले रही हैं

कुम्हारों को उम्मीद है कि इस दीपावली लोग मिट्टी के पारंपरिक दीयों को प्राथमिकता देंगे। उनका मानना है कि मिट्टी का दीया केवल रोशनी का साधन नहीं, बल्कि हमारी परंपरा, संस्कृति और कारीगरों की मेहनत से जुड़ा हुआ है।

दीपावली की रोशनी में अगर मिट्टी का एक दीया भी किसी कुम्हार के घर की उम्मीद जगा दे, तो त्योहार की खुशी और भी खास हो सकती है।