रक्सौल, पूर्वी चंपारण। भारतीय लोकतंत्र में सत्ता और विपक्ष दोनों की अपनी महत्वपूर्ण भूमिका है। सत्ता का दायित्व देश चलाना और संविधान के अनुरूप शासन करना है, जबकि विपक्ष का काम सरकार की नीतियों, निर्णयों और कार्यशैली पर सवाल उठाना तथा जनता के हितों की आवाज बुलंद करना है। लेकिन जब राजनीतिक मतभेद संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता और विश्वसनीयता तक पहुंचने लगें, तब यह केवल सत्ता और विपक्ष का विवाद नहीं रह जाता, बल्कि लोकतंत्र की बुनियाद से जुड़ा विषय बन जाता है।
इसी संदर्भ में इंडिया गठबंधन द्वारा 1 नवंबर 2026 को दिल्ली के रामलीला मैदान में प्रस्तावित विशाल रैली और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की कार्यशैली के विरोध में चलाया जा रहा अभियान राजनीतिक एवं लोकतांत्रिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। गठबंधन ने विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान मतदाता सूची में कथित अनियमितताओं, पात्र मतदाताओं के नाम हटने की आशंकाओं और चुनाव आयोग की निष्पक्षता को लेकर सवाल उठाए हैं। विपक्ष मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे, एसआईआर प्रक्रिया रद्द करने और मतपत्र से चुनाव कराने की मांग भी कर रहा है।
इस अभियान के तहत 30 अक्टूबर को मॉक पार्लियामेंट और प्रतीकात्मक जन-अभियोग की कार्यवाही का कार्यक्रम रखा गया है, जिसे निर्धारित सार्वजनिक स्थलों पर अनुमति नहीं मिलने के बाद कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के आवास पर आयोजित करने की बात सामने आई है। वहीं, 1 नवंबर को रामलीला मैदान में बड़ी रैली प्रस्तावित है। इस प्रकार दोनों कार्यक्रमों का उद्देश्य चुनावी व्यवस्था और संवैधानिक जवाबदेही के मुद्दे को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में लाना है।
आखिर चुनाव आयोग पर सवाल क्यों?
चुनाव आयोग भारतीय लोकतंत्र की एक अत्यंत महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्था है। उसका दायित्व केवल चुनाव कराना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि प्रत्येक पात्र नागरिक को मतदान का अधिकार मिले और चुनावी प्रक्रिया पर जनता का भरोसा बना रहे।
विशेष गहन मतदाता सूची पुनरीक्षण का उद्देश्य मतदाता सूची को सही, अद्यतन और त्रुटिरहित बनाना हो सकता है। लेकिन इस प्रक्रिया में यदि किसी पात्र नागरिक का नाम छूटता है या किसी व्यक्ति को अपना मतदान अधिकार सुरक्षित रखने में कठिनाई होती है, तो उसकी शिकायत का निष्पक्ष समाधान होना चाहिए।
विपक्ष के आरोपों की जांच तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर होनी चाहिए। दूसरी ओर, चुनाव आयोग को भी अपने निर्णयों, प्रक्रियाओं और आपत्तियों के निस्तारण में अधिकतम पारदर्शिता रखनी चाहिए। किसी संवैधानिक संस्था की गरिमा केवल उसके अधिकारों से नहीं, बल्कि उसके प्रति जनता के विश्वास से भी कायम रहती है।
सरकार का रवैया और विपक्ष की चुनौती
वर्तमान केंद्र सरकार और भाजपा की ओर से विपक्ष के आंदोलन को राजनीतिक विरोध और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत अपनी बात रखने के संदर्भ में देखा जा रहा है। भाजपा ने विपक्ष के आरोपों का मुकाबला करने के लिए अपना जनसंपर्क अभियान भी तेज किया है। उसका तर्क है कि सरकार का भविष्य सड़कों पर होने वाली रैलियों से नहीं, बल्कि जनता के मतदान से तय होता है।
यह भी लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण पक्ष है कि किसी भी सरकार को केवल विरोध प्रदर्शनों के आधार पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता। लेकिन सरकार की जिम्मेदारी यह भी है कि गंभीर सार्वजनिक सवालों का जवाब राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बजाय तथ्यों और पारदर्शिता के साथ दे।
विपक्ष के लिए भी यह आवश्यक है कि वह अपने आरोपों को ठोस प्रमाणों, दस्तावेजों और कानूनी प्रक्रियाओं के माध्यम से सामने रखे। केवल नारों, रैलियों और राजनीतिक भाषणों से जनता के मन में उठने वाले संदेहों का स्थायी समाधान नहीं हो सकता।
क्या आगे भी जारी रहेगा टकराव?
यह सवाल स्वाभाविक है कि 1 नवंबर की रैली के बाद राजनीतिक टकराव समाप्त होगा या और तेज होगा? इसका उत्तर केवल रैली में जुटने वाली भीड़ से नहीं मिलेगा। असली महत्व इस बात का होगा कि आंदोलन के बाद विपक्ष अपनी मांगों को किस प्रकार आगे बढ़ाता है, सरकार और चुनाव आयोग उन सवालों पर क्या प्रतिक्रिया देते हैं तथा न्यायिक और संवैधानिक स्तर पर क्या समाधान निकलता है।
यदि विपक्ष को अपने आरोपों पर ठोस जवाब नहीं मिलता और सरकार संवाद से दूरी बनाए रखती है, तो विवाद लंबा खिंच सकता है। इसके विपरीत, यदि चुनाव आयोग पारदर्शी तरीके से शिकायतों का निस्तारण करता है, सरकार आवश्यक स्पष्टीकरण देती है और विपक्ष भी तथ्यों के आधार पर अपनी बात रखता है, तो टकराव कम होने का रास्ता बन सकता है।
यहां एक महत्वपूर्ण संवैधानिक तथ्य भी समझना आवश्यक है। मुख्य चुनाव आयुक्त को केवल किसी मॉक पार्लियामेंट या जनसभा के प्रतीकात्मक फैसले से पद से नहीं हटाया जा सकता। संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत उन्हें हटाने की प्रक्रिया सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समान है। इसलिए राजनीतिक आंदोलन और संवैधानिक प्रक्रिया के बीच अंतर बनाए रखना जरूरी है।
लोकतंत्र में जीत किसी एक पक्ष की नहीं, जनता के विश्वास की होनी चाहिए
लोकतंत्र की खूबसूरती असहमति में है, लेकिन असहमति का उद्देश्य व्यवस्था को कमजोर करना नहीं, बल्कि उसे बेहतर बनाना होना चाहिए। सत्ता को यह नहीं भूलना चाहिए कि बहुमत शासन करने का अधिकार देता है, लेकिन जवाबदेही से मुक्त नहीं करता। वहीं विपक्ष को भी यह समझना चाहिए कि विरोध करना उसका अधिकार है, लेकिन उस अधिकार के साथ तथ्यों और जिम्मेदारी का निर्वाह भी आवश्यक है।
चुनाव आयोग की स्वतंत्रता, सरकार की जवाबदेही, विपक्ष की सक्रियता और नागरिकों के मतदान अधिकार—ये सभी लोकतंत्र के मजबूत स्तंभ हैं। इनमें से किसी एक पर भी जनता का भरोसा कमजोर होता है तो उसका प्रभाव पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था पर पड़ता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि राजनीतिक दल अपनी-अपनी प्रतिष्ठा और आरोप-प्रत्यारोप से ऊपर उठकर जनता के वास्तविक सवालों पर विचार करें। चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता हो, शिकायतों की सुनवाई निष्पक्ष हो और प्रत्येक पात्र नागरिक का मताधिकार सुरक्षित रहे।
अंततः लोकतंत्र की असली परीक्षा यह नहीं है कि कौन कितनी बड़ी रैली करता है या किसकी आवाज कितनी ऊंची है, बल्कि यह है कि जनता का विश्वास कितना मजबूत है। सत्ता और विपक्ष का टकराव लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा हो सकता है, लेकिन संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर उठे सवालों का समाधान संवाद, पारदर्शिता, प्रमाण और संविधान के रास्ते से ही संभव है। क्योंकि लोकतंत्र में कुर्सी किसी की स्थायी नहीं होती, लेकिन संविधान और जनता का विश्वास सर्वोपरि होता है।










