मतदाता सूची का पुनरीक्षण निष्पक्ष हो, हर पात्र नागरिक का अधिकार सुरक्षित रहे और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर जनता का विश्वास मजबूत बने। बिमल सर्राफ
रक्सौल पूर्वी चंपारण – लोकतंत्र की असली ताकत केवल चुनाव कराने में नहीं, बल्कि चुनाव प्रक्रिया पर जनता के विश्वास को बनाए रखने में है। मतदाता सूची इसी लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियाद है। यदि मतदाता सूची सही, पारदर्शी और निष्पक्ष होगी, तो चुनाव की विश्वसनीयता भी मजबूत होगी। लेकिन यदि मतदाता पंजीकरण की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठते हैं, तो उनका समाधान चुप्पी से नहीं, बल्कि स्पष्ट जवाब, ठोस प्रमाण और पारदर्शी कार्रवाई से होना चाहिए।
इन दिनों फॉर्म-6 और विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान मतदाता पंजीकरण की प्रक्रिया को लेकर जो सवाल उठाए जा रहे हैं, वे गंभीरता से विचार करने योग्य हैं। यह विषय किसी राजनीतिक दल के पक्ष या विपक्ष का नहीं, बल्कि नागरिक अधिकारों, कानून के पालन और लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता का है।
फॉर्म-6 का उद्देश्य स्पष्ट रहना चाहिए
भारत निर्वाचन आयोग के दिशा-निर्देशों के अनुसार, फॉर्म-6 का उपयोग मुख्य रूप से नए मतदाता के रूप में पंजीकरण के लिए किया जाता है। वहीं, मौजूदा मतदाता सूची में नाम, पते या अन्य विवरणों में सुधार तथा निवास स्थान बदलने जैसी परिस्थितियों के लिए निर्धारित अन्य प्रपत्रों का उपयोग किया जाता है।
ऐसे में यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि प्रत्येक आवेदन सही उद्देश्य से भरा जाए और उसकी जाँच निर्धारित नियमों के अनुसार हो। यदि किसी व्यक्ति का नाम पहले से मतदाता सूची में है, तो उसके मामले में लागू प्रक्रिया स्पष्ट की जानी चाहिए। यदि किसी नए पात्र मतदाता का नाम जोड़ा जा रहा है, तो उसके आवेदन और पात्रता का विधिवत सत्यापन होना चाहिए।
नियमों का पालन केवल कागजों पर नहीं, बल्कि प्रत्येक आवेदन की जाँच और निर्णय में दिखाई देना चाहिए।
पुराने मतदाताओं के नाम पर उठ रहे सवालों का जवाब कौन देगा?
यदि विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान ऐसे लोगों से नए सिरे से पंजीकरण संबंधी आवेदन लिए जा रहे हैं, जिनके नाम पहले मतदाता सूची में दर्ज थे, तो यह स्पष्ट होना चाहिए कि ऐसा किस परिस्थिति में और किस नियम के अंतर्गत किया जा रहा है।
क्या संबंधित मतदाता का नाम पिछली सूची में उपलब्ध है? क्या उसका नाम किसी कारणवश हट गया है? क्या वह दूसरे निर्वाचन क्षेत्र में स्थानांतरित हो चुका है? या फिर अभिलेखों में किसी प्रकार की त्रुटि है?
इन प्रश्नों का उत्तर अनुमान या राजनीतिक आरोपों से नहीं, बल्कि संबंधित मतदाता के अभिलेखों और लागू नियमों के आधार पर दिया जाना चाहिए।
यदि कहीं गलत प्रपत्र का उपयोग हुआ है या प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया है, तो उसकी निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए। साथ ही, केवल संदेह के आधार पर किसी नागरिक को गलत ठहराना भी उचित नहीं है।
कानून सबके लिए समान होना चाहिए
मतदाता सूची तैयार करने और उसमें संशोधन करने की प्रक्रिया कानून के अधीन संचालित होती है। जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 31 के अंतर्गत मतदाता सूची की तैयारी, संशोधन अथवा उसमें नाम शामिल करने या हटाने से संबंधित जानबूझकर की गई झूठी घोषणा दंडनीय है। इस प्रावधान के तहत एक वर्ष तक के कारावास, जुर्माने या दोनों का प्रावधान है।
लेकिन कानून का सही अर्थ तभी सामने आएगा, जब उसका इस्तेमाल निष्पक्षता के साथ हो। किसी व्यक्ति के विरुद्ध कार्रवाई करने से पहले तथ्यों की जाँच और लागू कानूनी प्रक्रिया का पालन आवश्यक है। इसी प्रकार, यदि किसी अधिकारी की ओर से कर्तव्य में गंभीर चूक हुई हो, तो उसकी भी नियमों के अनुसार जाँच होनी चाहिए।
कानून की विश्वसनीयता इसी में है कि वह न किसी को अनुचित संरक्षण दे और न किसी निर्दोष को अनुचित परेशानी में डाले।
चुनाव आयोग की जिम्मेदारी केवल प्रक्रिया चलाना नहीं, भरोसा कायम रखना भी है
चुनाव आयोग एक महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्था है। उसकी निष्पक्षता और विश्वसनीयता लोकतंत्र के लिए अत्यंत आवश्यक है। इसलिए जब किसी प्रक्रिया को लेकर गंभीर प्रश्न उठते हैं, तो उनका तथ्यात्मक और समयबद्ध समाधान करना संस्था के हित में भी है।
यदि फॉर्म-6 के इस्तेमाल, पुराने मतदाताओं के पुनः पंजीकरण या SIR के दौरान नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया को लेकर कोई भ्रम है, तो आयोग को स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करने चाहिए। संबंधित अधिकारियों को भी यह सुनिश्चित करना चाहिए कि आम नागरिकों को सही जानकारी मिले और पात्र मतदाता अनावश्यक भागदौड़ से बचें।
यदि किसी राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी या अन्य संबंधित अधिकारी ने नियमों की व्याख्या को लेकर कोई प्रस्ताव दिया है, तो उस प्रस्ताव की वैधानिक स्थिति और उसके पीछे के आधार को सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किया जाना चाहिए। किसी प्रस्ताव को केवल प्रस्तुत किए जाने के कारण अवैध या वैध मान लेना उचित नहीं होगा; उसकी जाँच संबंधित कानून और अधिकृत दिशा-निर्देशों के आधार पर होनी चाहिए।
मतदाता का अधिकार सर्वोपरि, प्रक्रिया का दुरुपयोग अस्वीकार्य
मतदाता सूची के पुनरीक्षण का उद्देश्य सूची को अधिक सटीक बनाना है। इसमें अपात्र प्रविष्टियों की पहचान, त्रुटियों का सुधार और पात्र नागरिकों का नाम सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है। लेकिन इस प्रक्रिया में किसी पात्र नागरिक का नाम गलत तरीके से छूट जाए, तो उसका लोकतांत्रिक अधिकार प्रभावित हो सकता है।
इसलिए हर नागरिक को अपने नाम की स्थिति जाँचने, आवश्यक दस्तावेज प्रस्तुत करने और लागू प्रक्रिया के अनुसार दावा या आपत्ति दर्ज कराने की सुविधा मिलनी चाहिए। निर्वाचन आयोग के मतदाता सेवा पोर्टल पर पंजीकरण, नाम खोजने और अन्य संबंधित सेवाओं की जानकारी उपलब्ध है।
प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वह लोगों को समय पर सूचना दे, आवेदन की स्थिति स्पष्ट करे और पात्र नागरिकों की समस्याओं का समाधान करे। दूसरी ओर, नागरिकों की जिम्मेदारी है कि वे सही जानकारी दें और अफवाहों के बजाय आधिकारिक तथ्यों पर भरोसा करें।
सवाल उठाना लोकतंत्र को कमजोर करना नहीं, उसे मजबूत करना है
लोकतंत्र में किसी भी संस्था की कार्यप्रणाली पर प्रश्न उठाना अपने आप में गलत नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि प्रश्न तथ्यों पर आधारित हों और उनके उत्तर भी प्रमाणों के साथ दिए जाएँ।
यदि किसी प्रक्रिया में अनियमितता का संदेह है, तो संबंधित दस्तावेजों, आवेदन संख्या, मतदाता सूची और आधिकारिक आदेशों के आधार पर जाँच की माँग की जानी चाहिए। यदि प्रक्रिया नियमों के अनुरूप है, तो आयोग को उसका स्पष्ट आधार जनता के सामने रखना चाहिए।
आरोप लगाने से पहले प्रमाण जरूरी हैं, लेकिन प्रमाण माँगने वालों को चुप करा देना भी समाधान नहीं है। निष्पक्ष जाँच, स्पष्ट संवाद और जवाबदेही ही विवादों को दूर करने का प्रभावी रास्ता है।
निष्कर्ष: मतदाता सूची की शुद्धता के साथ नागरिक अधिकारों की रक्षा भी जरूरी
मतदाता सूची का पुनरीक्षण एक महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक जिम्मेदारी है। इसका उद्देश्य चुनाव प्रक्रिया को अधिक विश्वसनीय बनाना होना चाहिए, न कि नागरिकों के मन में अनावश्यक भ्रम या असुरक्षा पैदा करना।
फॉर्म-6 का उपयोग हो या विशेष गहन पुनरीक्षण, प्रत्येक कदम कानून, स्पष्ट दिशा-निर्देश और पारदर्शी सत्यापन के अनुरूप होना चाहिए। जहाँ त्रुटि मिले, वहाँ सुधार हो; जहाँ अनियमितता प्रमाणित हो, वहाँ नियमानुसार कार्रवाई हो; और जहाँ भ्रम हो, वहाँ आधिकारिक स्पष्टीकरण दिया जाए।
चुनाव आयोग को चाहिए कि वह उठाए गए सवालों का तथ्यात्मक जवाब दे, संबंधित अधिकारियों के साथ समन्वय करे और मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करे। राजनीतिक दलों, प्रशासन और नागरिक समाज को भी इस विषय पर जिम्मेदारी से संवाद करना चाहिए।
लोकतंत्र केवल मतपेटी से नहीं चलता; वह विश्वास, निष्पक्षता और जवाबदेही से मजबूत होता है। मतदाता सूची में एक भी पात्र नागरिक का नाम अनुचित रूप से छूटना चिंता का विषय है, और किसी भी अपात्र प्रविष्टि को नियमों के विरुद्ध बनाए रखना भी स्वीकार्य नहीं होना चाहिए।
अंततः, लक्ष्य किसी संस्था को कठघरे में खड़ा करना मात्र नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था सुनिश्चित करना होना चाहिए जिसमें हर पात्र नागरिक को मताधिकार मिले, हर आवेदन की निष्पक्ष जाँच हो और चुनाव प्रक्रिया पर जनता का भरोसा कायम रहे।
क्योंकि मजबूत लोकतंत्र की पहचान केवल निष्पक्ष चुनाव नहीं, बल्कि निष्पक्ष चुनाव की प्रक्रिया पर जनता का अटूट विश्वास भी है।
उक्त विश्लेषण लायंस क्लब इंटरनेशनल, डिस्ट्रिक्ट 322ई, जोन 41 के जोन चेयरपर्सन सह डिस्ट्रिक्ट चेयरपर्सन एवं भारत विकास परिषद् , रक्सौल के सेवा संयोजक सह मीडिया प्रभारी सह सामाजिक कार्यकर्ता बिमल सर्राफ ने प्रेस से साझा किया।









