जीवन-मृत्यु ही शरीर का वास्तविक स्वरूप है : बिमल सर्राफ

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रक्सौल, पूर्वी चंपारण। जिसे जीवन के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान हो गया है, उसे न अपनी मृत्यु में कोई दुःख प्रतीत होता है और न ही दूसरों की मृत्यु का कष्ट होता है। उक्त विचार लायंस इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट (322 ई) के जोनल चेयरपर्सन, डिस्ट्रिक्ट चेयरपर्सन, सामाजिक कार्यकर्ता एवं भारत विकास परिषद, रक्सौल के सेवा संयोजक सह मीडिया प्रभारी बिमल सर्राफ ने प्रेस से साझा किए।

उन्होंने कहा कि किसी विशाल नगर के प्रमुख चौराहे पर खड़ा व्यक्ति देखता है कि प्रतिक्षण असंख्य व्यक्ति अपने-अपने कार्यक्रम के अनुसार इधर-उधर आते-जाते रहते हैं। वह स्वयं भी कहीं से आया है और कहीं जा रहा है, केवल कुछ क्षणों के लिए चौराहे का कौतूहल देख रहा है। इस अपने या दूसरों के आवागमन पर यदि वह व्यक्ति दुःख मनाए या विलाप करे, तो उसे अविवेकी ही कहा जाएगा।

उन्होंने कहा कि संसार के विशाल चौराहे पर भी ऐसे ही आवागमन की भीड़ लगी हुई है। एक की मृत्यु ही दूसरे का जन्म है और एक का जन्म ही दूसरे की मृत्यु। एक का सुख दूसरे का दुःख है और दूसरे का दुःख एक का हर्ष। यह आँख-मिचौली, यह भूल-भुलैया विवेकवानों के लिए एक चित्ताकर्षक, विनोदमयी क्रीड़ा है, परंतु अल्पबुद्धि व्यक्ति इसमें उलझ जाते हैं और इस कौतूहल को कोई महान आपत्ति मानकर सिर धुनते हैं, रोते-बिलखते हैं और पश्चाताप करते हैं।

उन्होंने कहा कि मृत्यु के दुःख का कारण शरीर का नष्ट होना नहीं, बल्कि जीवन के वास्तविक स्वरूप की जानकारी का अभाव है। जिसे अपने भीतर की दिव्यता का बोध हो गया, वह फिर इस संसार में केवल एक ही प्रकार से विचरण कर सकता है और वह है आनंद की ओर।

उन्होंने कहा कि आनंद क्या है? आनंद मनुष्य की वह निर्विकार अवस्था है, जो हर प्रकार की चिंता से परे, एकत्व के संग होती है। हमें चाहिए कि हम हर प्रकार के विषय-बंधनों से ऊपर उठकर स्वयं को देखना और समझना सीखें। यही आनंद की सच्ची यात्रा है।