दो साल पुराने बहुआरा मौत मामले में नया मोड़, डीआईजी से निष्पक्ष जांच की मांग

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निर्दोषों को फंसाने का आरोप, पोस्टमार्टम और एफएसएल रिपोर्ट के आधार पर हत्या की धारा हटाने की उठी मांग

मोतिहारी। पूर्वी चंपारण जिले के कल्याणपुर थाना क्षेत्र के बहुआरा गांव में 19 जून 2024 को हुई 80 वर्षीय वशिष्ठ सिंह की मौत का मामला एक बार फिर चर्चा में आ गया है। इस मामले में दर्ज हत्या कांड को लेकर मृतक के परिजन के सहयोगी दीपक तिवारी ने चंपारण परिक्षेत्र के पुलिस उप महानिरीक्षक (डीआईजी) को आवेदन सौंपकर उच्चस्तरीय एवं निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है। उनका आरोप है कि एक सामान्य मृत्यु को साजिश के तहत हत्या का रूप देकर चार निर्दोष लोगों को झूठे मुकदमे में फंसा दिया गया।

आवेदन के अनुसार, घटना वाले दिन वशिष्ठ सिंह अपने पैतृक भूमि की मापी करा रहे थे। मौके पर अमीन भी मौजूद था। बताया गया कि उन्होंने अमीन के लिए चाय बनाने को कहा और इसी दौरान खाट से उठने का प्रयास करते समय अचानक गिर पड़े। परिजन एवं अमीन ने तत्काल उन्हें उठाकर खाट पर लिटाया, लेकिन तब तक उनकी सांसें थम चुकी थीं।

आवेदक का आरोप है कि बाद में मृतक की छोटी बहू रीता देवी द्वारा पुलिस को यह बयान दिया गया कि डंडे से मारपीट कर उनकी हत्या की गई। इसी आधार पर कल्याणपुर थाना में कांड संख्या 179/2024 दर्ज किया गया और शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया।

बेगुनाही के समर्थन में चार अहम आधार

दीपक तिवारी ने डीआईजी को दिए आवेदन में चार महत्वपूर्ण बिंदुओं का उल्लेख करते हुए दावा किया है कि नामजद लोगों के खिलाफ हत्या का आरोप तथ्यों पर आधारित नहीं है।

पहला आधार यह बताया गया है कि नामजद विवेक कुमार घटना के समय मोतिहारी स्थित एम.एस. कॉलेज में इग्नू की परीक्षा दे रहा था। प्रशिक्षु उप पुलिस अधीक्षक की जांच रिपोर्ट में भी इस तथ्य की पुष्टि होने का दावा किया गया है।

दूसरा आधार यह है कि आरोपी अर्चना देवी घटना के समय चकिया के एक विद्यालय में अपने कर्तव्य का निर्वहन कर रही थीं। तत्कालीन उप पुलिस अधीक्षक की जांच में भी उनकी उपस्थिति विद्यालय में दर्ज होने की बात सामने आई थी।

तीसरा आधार चिकित्सकीय साक्ष्यों से जुड़ा है। आवेदन में कहा गया है कि पोस्टमार्टम करने वाले चिकित्सकों की राय तथा विज्ञान प्रयोगशाला (एफएसएल) की रिपोर्ट में मृत्यु का कारण हृदयाघात बताया गया है। रिपोर्ट में शरीर पर किसी प्रकार के बाहरी चोट के निशान नहीं मिलने का भी उल्लेख किया गया है।

चौथा आधार यह रखा गया है कि घटना के लगभग एक वर्ष बाद अनुसंधानकर्ता द्वारा प्राथमिकी की धाराओं में परिवर्तन कर मृतक के बड़े पुत्र अरुण सिंह को गिरफ्तार कर लिया गया, जबकि उपलब्ध साक्ष्य हत्या की पुष्टि नहीं करते।

दो लोगों को पहले ही मिली राहत

आवेदन में यह भी कहा गया है कि बाद में डीएसपी स्तर की जांच के उपरांत अर्चना देवी एवं संजय सिंह का नाम मामले से बाहर कर दिया गया। इसके बावजूद परिवार का आरोप है कि बड़े पुत्र अरुण सिंह अब भी जेल में हैं, जबकि छात्र विवेक राज लगातार कानूनी कार्रवाई और गिरफ्तारी के भय के कारण परेशान है, जिससे उसकी पढ़ाई और भविष्य प्रभावित हो रहा है।

आवेदक का कहना है कि पूरे मामले में साजिश के तहत एक प्राकृतिक मृत्यु को हत्या का रूप दिया गया तथा अनुसंधान में कथित अनियमितता और मिलीभगत के कारण निर्दोष लोगों को आरोपी बनाया गया।

डीआईजी से निष्पक्ष जांच की मांग

दीपक तिवारी ने अपने आवेदन में पुलिस उप महानिरीक्षक से पूरे प्रकरण की उच्चस्तरीय एवं निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है। उन्होंने अनुरोध किया है कि यदि उपलब्ध चिकित्सीय एवं वैज्ञानिक साक्ष्य हत्या की पुष्टि नहीं करते हैं, तो निर्दोष लोगों को हत्या के आरोप से मुक्त कर न्याय दिलाया जाए।

आवेदन के साथ प्राथमिकी की प्रति, चिकित्सीय राय, विज्ञान प्रयोगशाला (एफएसएल) की रिपोर्ट तथा धाराओं में परिवर्तन से संबंधित दस्तावेज भी संलग्न किए जाने की बात कही गई है।

हालांकि, इस पूरे मामले में पुलिस प्रशासन की ओर से अब तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। ऐसे में अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि डीआईजी स्तर पर इस आवेदन पर क्या निर्णय लिया जाता है और क्या मामले की पुनः निष्पक्ष जांच कराई जाती है।