संपादक संजय कुमार मिश्रा कि कलम से
22 अप्रैल 2025… तारीख वही है लेकिन अब से यह तारीख हर भारतीय के दिल में एक ज़ख्म की तरह दर्ज हो गई है। पहलगाम की वादियां, जो कभी शांति की मिसाल थी, उस दिन गोलियों से गूंज उठी। जिस धरती पर फूल खिलते हैं, जहां बहती नदियों की कलकल में जिंदगी गूंजती है,जिस घाटी को स्वर्ग कहा जाता है- वहां नर्क उतर आया। वहां उस दिन चीखें थी, खून था, लाशों की कतारें थी और बिखरे थे अधूरे सपने। 28 जिंदगियां बिना किसी गलती के- बस पल भर में छीन ली गई। वे लोग जो वहां सैर- सपाटे, शांति और प्रकृति की गोद मे गए थे- लौटे तो सिर्फ ताबूतों में, जो बच गए वे भी लौटे- लेकिन कभी न भर सकने वाले जख्मों को लेकर। आतंकवादियों ने सिर्फ गोलियां नहीं चलाई- उन्होंने भरोसे को छलनी किया। उन्होंने कश्मीर की उस छवि को लहूलुहान किया जिसे हम *धरती का स्वर्ग* कहते आए हैं। जब पहली गोली चली होगी, शायद किसी को यह गुमान भी न रहा होगा कि यह उनके जीवन की आखिरी शाम होगी। कुछ ने कैमरा उठाया होगा, कुछ ने बच्चों को गोद में छुपाया होगा, कुछ ने खुद से ज्यादा अपनों को बचाने की कोशिश की होगी। वे आम लोग थे- न सैनिक, न राजनेता, न अपराधी- फिर भी वे मारे गए, सिर्फ इसलिए की कोई उनके पीछे एक झूठे विचार का झंडा लहरा रहा था। गोलियां किसी की पहचान नहीं देखती, लेकिन गोलियां चलाने वालों ने देखी। दरिंदे सिर्फ तबाही लाते हैं और उस दिन उन्होंने लाई। हमारा ‘ धरती का स्वर्ग’ उस दिन ‘ धरती का श्मशान’ बन गया। घाटियों की हरियाली खून से लाल हो गई।बर्फ से ढके पहाड़ों पर आंसूओं की गर्मी थी। यह हमला किसी एक व्यक्ति पर नहीं भारत की आत्मा पर था। लेकिन कुछ सवाल है जो पीछा नहीं छोड़ते और छोड़ भी नहीं रहे। क्यों वे लोग मारे गए जो किसी के दुश्मन नहीं थे?क्यों हर कुछ महीनो में आतंकवाद इस देश की मासूमियत को निगल लेता है? भारत बार-बार आतंकवाद के खिलाफ आवाज उठाता रहा, हमने सर्जिकल स्ट्राइक की ,एयर स्ट्राइक की, लेकिन आतंकवादी घटनाएं रुक नहीं रही। हर हमले के बाद कुछ दिनों की रोशनी जलती है- टीवी चैनलों की ब्रेकिंग न्यूज़, नेताओं के भाषण, और सोशल मीडिया की गुस्सैल पोस्टें। फिर वही खामोशी लौट आती है – वही डर ,वही इंतजार अगली बार का।
हमारे देश की जनता अब थक चुकी है। हर बार शहीदों की तस्वीरों को मोमबत्तियों से ढक देना ही देशभक्ति नहीं हो सकती ।अब जरूरत है स्थाई नीति की, स्पष्ट मंशा की और सामूहिक चेतना की। सरकार से सवाल करना देशद्रोह नहीं- लोकतंत्र का दायित्व है। लेकिन सरकार को सिर्फ कोसना वह भी तब, जब चिताएं जल रही हो – यह भी इंसानियत नहीं। फिर सवाल यह है कि हम क्या करें? यह सवाल बार-बार उठता है, बार-बार उठ रहा है।क्या हम केवल मोमबत्तियां जलाते रहेंगे? क्या हमारा विरोध सिर्फ सोशल मीडिया तक सीमित रहेगा? नहीं, हमें खुद को बदलना होगा।हमारी आवाज को संसद तक पहुंचाना होगा – लोकतांत्रिक और ज़िम्मेदार तरीकों से।
हमें वोट की ताकत से सवाल पूछने होंगे- सुरक्षा नीति पर, खुफिया तंत्र की तैयारी पर। हमें सेना और सरकार के बीच खाई नहीं, पुल बनना होगा- आलोचना के साथ भरोसा भी ज़रूरी है। हमें अपने बच्चों को सिखाना होगा की देशभक्ति सिर्फ जज्बात नहीं, कर्तव्य है। देश में करोड़ों लोगों की भावना है कि पाकिस्तान से एक बार फिर युद्ध हो, लेकिन यह समझना होगा कि युद्ध को तैयारी से लड़ा जाता है, भावुकता से नहीं। इस बार देश को चाहिए- आतंकवाद के खिलाफ निर्णायक प्रहार और जनता की एकजुटता। पहल सिर्फ सरकार को नहीं करना है- हमारी भी ज़िम्मेदारी बनती है। सरकारें बदलती रहेगी, नेता आते जाते रहेंगे। लेकिन देश हम सबका है।हमें फर्जी राष्ट्रवाद और अभिव्यक्ति के बीच का फर्क समझना होगा। हर माता-पिता को यह भरोसा होना चाहिए कि उनका बच्चा सुरक्षित है चाहे वह दिल्ली में हो या श्रीनगर में। हर सैलानी को यह भरोसा होना चाहिए कि वह जहां भी जाए वहां से जिंदा लौटेगा- यादें लेकर, जख्म नहीं।आतंकवादी का कोई धर्म नहीं होता। वह केवल एक हत्यारा होता है- इंसानियत का कातिल। जो बेकसूरों की जान ले लेता है – वह किसी भी धर्म का नहीं हो सकता। आज पहलगाम खामोश है। पेड़, नदिया, पहाड़- सब गुमसुम है। लेकिन इस खामोशी में एक पुकार छिपी है- इंसानियत की पुकार। हमसे पूछा जा रहा है क्या तुम जागोगे? क्या तुम लड़ोगे? क्या तुम इंसानियत को जिंदा रखोगे? इस देश की रगों में अब सिर्फ खून नहीं बहना चाहिए – बल्कि न्याय, सुरक्षा और उम्मीद बहनी चाहिए। ताकि अगली बार जब कोई बच्चा पहलगाम जाए तो वे सिर्फ बर्फ के गोले देखे – गोलियां नहीं ।










