कुर्सी का मोह, अवसरवाद और राजनीतिक निष्ठा का संकट लोकतंत्र की विश्वसनीयता पर खड़े कर रहे हैं गंभीर सवाल
रक्सौल, पूर्वी चंपारण। लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने और सरकार बनाने का नाम नहीं है। इसकी असली ताकत विचारधारा, जनविश्वास, नैतिकता और जनता के प्रति जवाबदेही में निहित है। लेकिन जब जनसेवा की जगह पद का मोह और सिद्धांतों की जगह स्वार्थ लेने लगता है, तब लोकतंत्र की आत्मा कमजोर होने लगती है। भारतीय राजनीति में बढ़ती दल-बदल की प्रवृत्ति इसी गंभीर चुनौती की ओर संकेत करती है।
राजनीति में विचारों का मतभेद स्वाभाविक है। परिस्थितियों के अनुसार नीतियों की समीक्षा करना और असहमति जताना लोकतंत्र का हिस्सा है। इसलिए हर राजनीतिक बदलाव को गलत नहीं कहा जा सकता। लेकिन जब कोई नेता चुनाव के समय एक विचारधारा के नाम पर जनता से वोट मांगता है और जीतने के बाद केवल सत्ता, पद या व्यक्तिगत लाभ के लिए पाला बदल लेता है, तब उसकी निष्ठा और नैतिकता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
सिद्धांतों पर भारी पड़ता सत्ता का समीकरण
देश के विभिन्न राज्यों में नेताओं के दल बदलने से राजनीतिक समीकरण बदलते रहे हैं। कई बार जनता जिस दल की नीतियों और घोषणापत्र पर भरोसा करके प्रतिनिधि चुनती है, वही प्रतिनिधि बाद में दूसरे राजनीतिक खेमे में दिखाई देता है। ऐसे में मतदाता के मन में सवाल उठता है कि उसका वोट विचारधारा और जनहित के लिए था या केवल किसी ऐसे व्यक्ति के लिए, जो परिस्थितियों के अनुसार अपना राजनीतिक ठिकाना बदल सकता है।
राजनीतिक गठबंधन लोकतंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और अलग-अलग विचारधाराओं वाले दल भी साझा कार्यक्रम के आधार पर साथ आ सकते हैं। लेकिन जब कल तक एक-दूसरे की नीतियों की आलोचना करने वाले नेता बिना स्पष्ट कारण बताए साथ आ जाते हैं, तो जनता के सामने विश्वसनीयता का संकट पैदा होता है। राजनीतिक परिस्थितियां बदल सकती हैं, लेकिन नेताओं को अपने निर्णयों का कारण जनता के सामने स्पष्ट करना चाहिए।
दल-बदल : विवेक या अवसरवाद?
हर दल-बदल के पीछे एक जैसी वजह नहीं होती। कभी दल के भीतर संवाद की कमी, नेतृत्व से असहमति या नीतिगत बदलाव इसके कारण बन सकते हैं। इसलिए किसी भी मामले का मूल्यांकन परिस्थितियों को समझकर करना चाहिए। लेकिन यदि व्यक्तिगत लाभ के लिए जनता से किए गए वादों और राजनीतिक प्रतिबद्धताओं को भुला दिया जाए, तो यह अवसरवाद का उदाहरण बन सकता है।
भारत में संविधान की दसवीं अनुसूची के अंतर्गत दल-बदल विरोधी प्रावधान मौजूद हैं। हालांकि, हर दल बदलना अपने आप में अयोग्यता का आधार नहीं बनता। इसका निर्णय कानून में निर्धारित परिस्थितियों और प्रक्रियाओं के अनुसार होता है। इसलिए जरूरी है कि कानून का निष्पक्ष और समयबद्ध क्रियान्वयन हो। साथ ही, नेताओं को कानूनी प्रावधानों के अलावा नैतिक जवाबदेही का भी ध्यान रखना चाहिए।
राजनीतिक दलों को भी करना होगा आत्ममंथन
दल-बदल के लिए केवल नेताओं को दोष देना पर्याप्त नहीं है। राजनीतिक दलों को भी अपने संगठन में आंतरिक लोकतंत्र, पारदर्शिता और संवाद को मजबूत करना होगा। कार्यकर्ताओं और जनप्रतिनिधियों को अपनी बात रखने का अवसर मिलना चाहिए। जब योग्य लोगों की उपेक्षा होती है और निर्णय सीमित व्यक्तियों तक सिमट जाते हैं, तब असंतोष बढ़ना स्वाभाविक है।
वहीं, जनता की भी जिम्मेदारी है कि वह चुनाव के समय उम्मीदवारों के विचारों, कार्यों और राजनीतिक इतिहास का मूल्यांकन करे। जाति, धर्म और भावनात्मक नारों से ऊपर उठकर विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सामाजिक सद्भाव और ईमानदार नेतृत्व को प्राथमिकता देना जरूरी है।
जनादेश का सम्मान ही लोकतंत्र की असली ताकत
लोकतंत्र की परीक्षा केवल चुनाव के दिन नहीं, बल्कि चुनाव जीतने के बाद भी होती है। जनप्रतिनिधि जनता के विश्वास के सहारे सदन तक पहुंचते हैं। इसलिए उनका दायित्व है कि वे अपने निर्णयों में पारदर्शिता रखें और जनता के प्रति जवाबदेह बने रहें।
राजनीति में पद और सत्ता स्थायी नहीं होते। आज जो सत्ता में है, वह कल विपक्ष में हो सकता है। लेकिन जनता का विश्वास किसी भी पद से बड़ा है। विचार बदलना किसी व्यक्ति का अधिकार हो सकता है, पर उसके निर्णयों का कारण पूछना जनता का अधिकार है।
लोकतंत्र तभी मजबूत होगा, जब नेता कुर्सी से अधिक सिद्धांतों, निजी लाभ से अधिक जनहित और राजनीतिक सुविधा से अधिक जनादेश के सम्मान को महत्व देंगे। क्योंकि राजनीति की असली जीत सरकार बनाने में नहीं, बल्कि जनता के विश्वास को बनाए रखने में है।










