रक्सौल, पूर्वी चंपारण। विश्व आज विज्ञान, प्रौद्योगिकी और संचार के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति कर रहा है। देशों के बीच दूरियाँ कम हुई हैं, वैश्विक संपर्क बढ़ा है और विचारों का आदान-प्रदान पहले की अपेक्षा कहीं अधिक सरल हो गया है। इसके बावजूद विडंबना यह है कि विश्व के अनेक हिस्सों में असहिष्णुता, कट्टरता, हिंसा, वैचारिक टकराव और सामाजिक विभाजन की प्रवृत्ति बढ़ती दिखाई दे रही है। यह केवल किसी एक देश या समाज की समस्या नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के सामने एक गंभीर चुनौती बन चुकी है।
उक्त विचार लायंस क्लब इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 322 ई के जोनल चेयरपर्सन, डिस्ट्रिक्ट चेयरपर्सन, भारत विकास परिषद्, रक्सौल के सेवा संयोजक, मीडिया प्रभारी एवं सामाजिक कार्यकर्ता बिमल सर्राफ ने प्रेस से बातचीत के दौरान व्यक्त किए।
असहिष्णुता क्या है?
असहिष्णुता का अर्थ केवल किसी व्यक्ति, समुदाय, धर्म, संस्कृति या विचार से असहमति रखना नहीं है, बल्कि उसे स्वीकार करने से इनकार करना, उसके प्रति घृणा, भेदभाव, उपेक्षा या हिंसक व्यवहार अपनाना भी है। विचारों की विविधता मानव सभ्यता की पहचान है, किंतु जब असहमति वैमनस्य में बदल जाती है, तभी असहिष्णुता जन्म लेती है।
वर्तमान वैश्विक परिदृश्य
आज विश्व के अनेक देशों में राजनीतिक ध्रुवीकरण, धार्मिक कट्टरता, नस्लीय भेदभाव, सांस्कृतिक संघर्ष, युद्ध, आतंकवाद, प्रवासियों के प्रति असहिष्णुता तथा सोशल मीडिया के माध्यम से फैल रही घृणा जैसी चुनौतियाँ सामने हैं। तकनीक ने लोगों को जोड़ने का कार्य किया है, लेकिन कई बार यही तकनीक अफवाहों, गलत सूचनाओं और नफरत फैलाने का माध्यम भी बन जाती है।
दूसरी ओर, यह भी सत्य है कि विश्व के अधिकांश लोग आज भी शांति, सहयोग, सह-अस्तित्व और मानवता के मूल्यों में विश्वास रखते हैं। विभिन्न देशों और संस्कृतियों के लोग शिक्षा, व्यापार, विज्ञान, खेल और मानवीय सेवा के क्षेत्र में मिलकर कार्य कर रहे हैं। यही मानव सभ्यता की सबसे बड़ी आशा है।
सहिष्णुता का महत्व
सहिष्णुता का अर्थ अपनी पहचान खो देना नहीं, बल्कि दूसरों की पहचान और विचारों के सम्मान के साथ जीना है। लोकतंत्र हो या कोई भी सामाजिक व्यवस्था, उसका आधार संवाद, परस्पर सम्मान और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व होता है। मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन मतभेद को संघर्ष का कारण बना देना समाज को कमजोर करता है।
असहिष्णुता के प्रमुख कारण
• राजनीतिक एवं वैचारिक ध्रुवीकरण।
• धार्मिक एवं सांस्कृतिक कट्टरता।
• नस्लीय, जातीय और सामाजिक भेदभाव।
• सोशल मीडिया पर भ्रामक सूचनाओं एवं घृणा फैलाने वाली सामग्री का प्रसार।
• संवाद, धैर्य और संवेदनशीलता में कमी।
• आर्थिक असमानता, भय और असुरक्षा की बढ़ती भावना।
समाधान क्या हो सकता है?
असहिष्णुता का समाधान केवल कानूनों से संभव नहीं है। इसके लिए परिवार, विद्यालय, समाज, मीडिया, धार्मिक संस्थाओं और विश्व नेतृत्व को मिलकर सहिष्णुता, मानवाधिकार, संवैधानिक मूल्यों और नैतिक शिक्षा को बढ़ावा देना होगा। शिक्षा ऐसी हो जो केवल ज्ञान ही नहीं, बल्कि मानवता, करुणा और परस्पर सम्मान की भावना भी विकसित करे। सोशल मीडिया का उपयोग संवाद, जागरूकता और सकारात्मक परिवर्तन के लिए होना चाहिए, न कि नफरत फैलाने के लिए।
निष्कर्ष
आज मानवता एक ऐसे दौर से गुजर रही है, जहाँ विज्ञान ने दुनिया को निकट ला दिया है, लेकिन दिलों की दूरियाँ कई स्थानों पर अब भी बनी हुई हैं। यदि विश्व को शांति, स्थिरता और सतत विकास की दिशा में आगे बढ़ाना है, तो सहिष्णुता, संवाद, करुणा और परस्पर सम्मान को जीवन का आधार बनाना होगा।
वसुधैव कुटुम्बकम्— “संपूर्ण विश्व एक परिवार है”— का भारतीय दर्शन आज पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक है। जब हम जाति, धर्म, भाषा, राष्ट्र और विचारधारा से ऊपर उठकर मानवता को सर्वोच्च स्थान देंगे, तभी एक शांतिपूर्ण, न्यायपूर्ण और समावेशी विश्व की स्थापना संभव होगी। यही आज की सबसे बड़ी आवश्यकता और समस्त मानव समाज की साझा जिम्मेदारी है।









