जहां विचारों को मिलती है आजादी, वहीं समाज में जन्म लेती है नई क्रांति

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हर व्यक्ति की सोच एक जैसी होना जरूरी नहीं, लेकिन हर व्यक्ति की आवाज का सम्मान होना जरूरी है। असहमति विरोध नहीं, बल्कि बेहतर समाज के निर्माण की पहली सीढ़ी है।

रक्सौल, पूर्वी चंपारण। बिमल सर्राफ

समाज की सुंदरता एक जैसी सोच रखने वाले लोगों से नहीं, बल्कि अलग-अलग विचारों के बावजूद एक-दूसरे का सम्मान करने वाले लोगों से बनती है। हर व्यक्ति का अपना अनुभव, अपना नजरिया और अपनी समझ होती है। ऐसे में विचारों का अलग होना स्वाभाविक है। लेकिन जब हम अपनी सोच को ही अंतिम सत्य मानने लगते हैं और दूसरों के विचारों को सुनने से इनकार कर देते हैं, तब संवाद की जगह टकराव और समझदारी की जगह अहंकार लेने लगता है।

वास्तव में असहमति किसी भी जीवंत समाज की पहचान है। जहां लोग सवाल पूछते हैं, गलतियों की ओर ध्यान दिलाते हैं और व्यवस्था में सुधार की मांग करते हैं, वहां जागरूकता का वातावरण बनता है। असहमति का अर्थ किसी का अपमान करना या किसी व्यवस्था को कमजोर करना नहीं, बल्कि कमियों को पहचानकर उसे बेहतर बनाने का प्रयास करना है।

सहमति से रास्ते आसान होते हैं, लेकिन असहमति से नए रास्तों की खोज होती है।

इतिहास इस बात का गवाह है कि दुनिया में अनेक बड़े सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन तब आए, जब कुछ लोगों ने प्रचलित मान्यताओं पर सवाल उठाने का साहस किया। यदि हर व्यक्ति बिना सोचे-समझे पुरानी व्यवस्था को स्वीकार कर लेता, तो समाज में नई सोच, नए विचार और सुधार की संभावनाएं बहुत सीमित रह जातीं। इसलिए सवाल पूछने की प्रवृत्ति को दबाने के बजाय उसे सही दिशा देना चाहिए।

लोकतंत्र में असहमति का महत्व और भी बढ़ जाता है। लोकतंत्र केवल बहुमत की राय से सरकार बनाने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह हर नागरिक को अपनी बात रखने और व्यवस्था से जवाब मांगने का अधिकार भी देता है। विपक्ष की भूमिका, स्वतंत्र विचार, निष्पक्ष आलोचना और जनता के सवाल लोकतंत्र को मजबूत बनाते हैं। बहुमत का सम्मान होना चाहिए, लेकिन अल्पमत की आवाज को भी उतना ही महत्व मिलना चाहिए।

आज चिंता की बात यह है कि समाज में विचारों का अंतर धीरे-धीरे व्यक्तिगत दुश्मनी का रूप लेता जा रहा है। किसी की बात पसंद न आने पर उसे गलत ठहरा देना, उसकी नीयत पर सवाल उठाना या उसे अपने विरोधी खेमे का मान लेना एक गलत सामाजिक प्रवृत्ति बनती जा रही है। सोशल मीडिया ने भी कई बार इस प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया है, जहां बिना पूरी बात समझे प्रतिक्रिया देने और दूसरों को नीचा दिखाने की होड़ लगी रहती है।

हमें यह समझना होगा कि किसी व्यक्ति के विचारों से असहमत होने का अर्थ यह नहीं कि उस व्यक्ति के प्रति हमारे मन में सम्मान भी समाप्त हो जाए। विचारों का विरोध कीजिए, व्यक्ति का अपमान नहीं। तर्क से जवाब दीजिए, कटु शब्दों से नहीं। अपनी बात मजबूती से रखिए, लेकिन दूसरों को बोलने का अवसर भी दीजिए।

असहमति की भी अपनी मर्यादा होती है। विरोध के नाम पर हिंसा, तोड़फोड़, अपशब्द और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना किसी भी तरह उचित नहीं है। लोकतांत्रिक विरोध का उद्देश्य सुधार होना चाहिए, समाज में भय और अव्यवस्था पैदा करना नहीं। शांतिपूर्ण प्रदर्शन, तथ्यपूर्ण आलोचना और रचनात्मक सुझाव ही बदलाव के वास्तविक माध्यम हैं।

आलोचना से घबराने वाला समाज ठहर जाता है, जबकि आलोचना को समझने वाला समाज आगे बढ़ता है।

यह सिद्धांत केवल राजनीति तक सीमित नहीं है। परिवार में भी बच्चों को अपनी बात रखने का अवसर मिलना चाहिए। किसी संगठन में प्रत्येक सदस्य की राय सुनी जानी चाहिए। सामाजिक संस्थाओं में निर्णय केवल कुछ लोगों की इच्छा से नहीं, बल्कि सामूहिक विचार-विमर्श से होने चाहिए। जब लोगों को लगता है कि उनकी बात का महत्व है, तब उनके भीतर जिम्मेदारी और अपनापन भी बढ़ता है।

मेरे विचार से किसी व्यक्ति की महानता इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि कितने लोग उससे सहमत हैं, बल्कि इस बात से पहचानी जानी चाहिए कि वह अपने विरोधी विचारों को कितने धैर्य और सम्मान से सुनता है। जो व्यक्ति अपनी गलती स्वीकार करने का साहस रखता है, वही वास्तव में सीखने और आगे बढ़ने की क्षमता रखता है।

हमें यह भी याद रखना चाहिए कि हर आलोचना विरोध नहीं होती और हर प्रशंसा सच्चाई का प्रमाण नहीं होती। कभी-कभी विरोध करने वाला व्यक्ति भी हमारा सबसे बड़ा शुभचिंतक साबित हो सकता है, क्योंकि वह हमारी उन कमियों को सामने लाता है जिन्हें हम स्वयं नहीं देख पाते।

इसलिए आवश्यक है कि हम अपने भीतर सहनशीलता, विनम्रता और आत्ममंथन की भावना विकसित करें। दूसरों की बात सुनें, तथ्यों को समझें और उचित लगे तो अपने विचारों में बदलाव करने से भी पीछे न हटें। विचारों में दृढ़ता अच्छी बात है, लेकिन विचारों के प्रति कट्टरता प्रगति में बाधा बन सकती है।

अंततः समाज की असली पहचान इस बात से नहीं होती कि वहां कितने लोग एक जैसी बात करते हैं, बल्कि इस बात से होती है कि अलग-अलग विचार रखने वाले लोग कितनी शालीनता से एक साथ रह पाते हैं।

हमें ऐसा समाज बनाना है, जहां सवाल पूछने वाले को विरोधी नहीं समझा जाए, आलोचना करने वाले को दुश्मन नहीं माना जाए और असहमति रखने वाले की आवाज को दबाया नहीं जाए। क्योंकि विचारों की स्वतंत्रता से जागरूक नागरिक बनते हैं, संवाद से आपसी विश्वास बढ़ता है और सहनशीलता से सामाजिक एकता मजबूत होती है।

याद रखिए, जहां असहमति का सम्मान होता है, वहां विचारों का विकास होता है; जहां विचारों का विकास होता है, वहां लोकतंत्र मजबूत होता है और जहां लोकतंत्र मजबूत होता है, वहीं एक जागरूक, संवेदनशील और समृद्ध समाज का निर्माण संभव होता है।

उक्त विश्लेषण लायंस क्लब इंटरनेशनल, डिस्ट्रिक्ट 322ई,जोन 41 के जोन चेयरपर्सन सह डिस्ट्रिक्ट चेयरपर्सन एवं भारत विकास परिषद् , रक्सौल के सेवा संयोजक सह मीडिया प्रभारी सह सामाजिक कार्यकर्ता बिमल सर्राफ ने प्रेस से साझा किया।