चेहरे बदलते रहे, दौर बदलता रहा, लेकिन राजनीति का चरित्र कब बदलेगा

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रक्सौल पूर्वी चंपारण विमल सर्राफ

सत्ता का असली उद्देश्य शासन करना नहीं, बल्कि जनता के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाना है। लोकतंत्र की सार्थकता चुनाव जीतने में नहीं, बल्कि जनता का विश्वास जीतने में है।

आज भारतीय राजनीति एक ऐसे दौर से गुजर रही है, जहाँ समय के साथ राजनीतिक चेहरे बदल रहे हैं, चुनावी रणनीतियाँ बदल रही हैं, प्रचार के तरीके बदल रहे हैं और सत्ता हासिल करने के नए-नए समीकरण बन रहे हैं। सोशल मीडिया ने राजनीति को घर-घर तक पहुँचा दिया है। भाषणों की भाषा बदली है, चुनाव प्रचार का अंदाज बदला है और नेताओं की छवि प्रस्तुत करने के तरीके भी बदल गए हैं। लेकिन एक बुनियादी सवाल आज भी हमारे सामने खड़ा है—क्या राजनीति का चरित्र भी बदला है?

लोकतंत्र में सत्ता किसी व्यक्ति, परिवार या राजनीतिक दल की निजी संपत्ति नहीं होती। सत्ता जनता की अमानत है और उसका इस्तेमाल जनता के हित में होना चाहिए। लेकिन दुर्भाग्य से आज राजनीति का एक बड़ा हिस्सा जनसेवा की भावना से अधिक सत्ता प्राप्त करने और उसे बनाए रखने की रणनीति में उलझता दिखाई देता है।

चुनाव का उत्सव, जनता के सवाल और अधूरे वादे

हर चुनाव से पहले विकास, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, महँगाई और किसानों की खुशहाली जैसे मुद्दे प्रमुखता से उठाए जाते हैं। जनता को बेहतर भविष्य के सपने दिखाए जाते हैं। राजनीतिक दल अपने-अपने घोषणापत्रों में बड़े-बड़े वादे करते हैं। लेकिन चुनाव समाप्त होते ही कई महत्वपूर्ण सवाल धीरे-धीरे राजनीतिक प्राथमिकताओं से पीछे चले जाते हैं।

जनता यह जानना चाहती है कि युवाओं को रोजगार कब मिलेगा? किसानों की आय और उनकी आर्थिक स्थिति में वास्तविक सुधार कब होगा? सरकारी विद्यालयों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा कब उपलब्ध होगी? गरीबों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएँ कब मिलेंगी? महँगाई से आम आदमी को राहत कब मिलेगी?

इन सवालों का जवाब केवल नारों और भाषणों से नहीं, बल्कि जमीन पर दिखाई देने वाले परिणामों से मिलना चाहिए।

लोकतंत्र में असहमति कमजोरी नहीं, ताकत है

एक स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान केवल चुनाव कराना नहीं, बल्कि जनता को सवाल पूछने, अपनी बात रखने और सरकार की नीतियों की आलोचना करने की स्वतंत्रता देना भी है।

सरकार की प्रशंसा करना जितना लोकतांत्रिक अधिकार है, उतना ही सरकार की कमियों पर सवाल उठाना भी नागरिकों का अधिकार है। आलोचना को विरोध या दुश्मनी समझना लोकतांत्रिक मूल्यों को कमजोर करता है।

सरकारें आती-जाती रहती हैं, लेकिन लोकतांत्रिक संस्थाएँ, संवैधानिक मर्यादाएँ और नागरिक अधिकार स्थायी महत्व रखते हैं। इसलिए सत्ता में बैठे लोगों को यह समझना होगा कि असहमति का सम्मान करना उनकी कमजोरी नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक परिपक्वता का प्रमाण है।

शिक्षा और रोजगार: विकास की असली कसौटी

किसी भी देश की वास्तविक प्रगति का मूल्यांकन केवल सड़कों, पुलों, इमारतों और बड़े-बड़े निर्माण कार्यों से नहीं किया जा सकता। विकास का सबसे महत्वपूर्ण पैमाना यह है कि उस देश का युवा कितना शिक्षित, आत्मनिर्भर और रोजगार के अवसरों से जुड़ा हुआ है।

आज भी अनेक प्रतिभाशाली युवा उचित अवसरों के अभाव में संघर्ष कर रहे हैं। डिग्रियाँ बढ़ रही हैं, लेकिन रोजगार की चुनौतियाँ भी बनी हुई हैं। गाँवों से शहरों की ओर पलायन जारी है। गरीब और मध्यमवर्गीय परिवार अपने बच्चों की शिक्षा पर अपनी जीवनभर की कमाई लगा देते हैं, लेकिन उन्हें उनकी योग्यता के अनुरूप अवसर नहीं मिल पाते।

सरकारी शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करना, तकनीकी और व्यावसायिक प्रशिक्षण को बढ़ावा देना तथा छोटे और मध्यम उद्योगों को प्रोत्साहित करना समय की आवश्यकता है।

युवाओं को केवल चुनावी सभाओं में देश का भविष्य बताना पर्याप्त नहीं है। उन्हें ऐसा वर्तमान देना होगा, जिसमें वे अपने भविष्य का निर्माण सम्मान और आत्मविश्वास के साथ कर सकें।

किसान, मजदूर और आम आदमी को केंद्र में रखे राजनीति

देश की अर्थव्यवस्था की मजबूती का आधार किसान, मजदूर, छोटे व्यापारी और मेहनतकश नागरिक हैं। खेतों में अन्न उगाने वाला किसान, निर्माण कार्यों में पसीना बहाने वाला मजदूर और छोटे कारोबार से परिवार चलाने वाला व्यापारी देश की प्रगति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

लेकिन इन वर्गों की समस्याएँ आज भी गंभीर हैं। खेती की बढ़ती लागत, बाजार में उचित मूल्य की अनिश्चितता, मजदूरों की आर्थिक असुरक्षा और छोटे व्यापारियों पर बढ़ता दबाव ऐसे विषय हैं, जिन पर निरंतर और गंभीर राजनीतिक पहल की आवश्यकता है।

विकास का लाभ तभी सार्थक है, जब उसकी रोशनी समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे। यदि बड़ी-बड़ी परियोजनाओं के बीच गरीब की रसोई, किसान की आय और मजदूर की मजदूरी की चिंता पीछे छूट जाए, तो विकास की तस्वीर अधूरी ही मानी जाएगी।

जाति और धर्म की राजनीति से ऊपर उठने की जरूरत

भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी विविधता, सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक एकता है। यहाँ अनेक धर्मों, भाषाओं, जातियों और परंपराओं के लोग सदियों से साथ रहते आए हैं।

राजनीतिक मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन सामाजिक विभाजन किसी भी राष्ट्र के लिए शुभ संकेत नहीं है। चुनावी लाभ के लिए जाति, धर्म और भावनात्मक मुद्दों को बार-बार केंद्र में लाने के बजाय शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सुरक्षा और विकास जैसे वास्तविक मुद्दों पर प्रतिस्पर्धा होनी चाहिए।

किसी नागरिक की पहचान उसकी जाति या धर्म से पहले उसकी नागरिकता और उसके संवैधानिक अधिकारों से होनी चाहिए।

हमें ऐसा भारत बनाना है, जहाँ किसी की योग्यता का मूल्यांकन उसकी जाति से नहीं, उसके ज्ञान और कर्म से हो; जहाँ किसी को उसके धर्म के कारण नहीं, बल्कि उसके चरित्र और योगदान के आधार पर सम्मान मिले।

मीडिया और सोशल मीडिया की भी है बड़ी जिम्मेदारी

आज सोशल मीडिया राजनीति का एक प्रभावशाली माध्यम बन चुका है। सूचना कुछ ही सेकंड में लाखों लोगों तक पहुँच जाती है। लेकिन इसके साथ भ्रामक सूचनाओं, अधूरी खबरों, व्यक्तिगत आरोपों और प्रायोजित प्रचार की चुनौती भी बढ़ी है।

मीडिया का काम केवल सत्ता की प्रशंसा करना या विपक्ष की आलोचना करना नहीं होना चाहिए। उसका वास्तविक दायित्व जनता के सवालों को सामने लाना, तथ्यों की जाँच करना और सत्ता को जवाबदेह बनाए रखना है।

पत्रकारिता की विश्वसनीयता निष्पक्षता, साहस और जनहित से बनती है, न कि किसी राजनीतिक विचारधारा के प्रति अंधसमर्थन से।

वहीं नागरिकों की भी जिम्मेदारी है कि वे किसी खबर को बिना जाँचे आगे न बढ़ाएँ। लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए जागरूक मतदाता और जिम्मेदार मीडिया दोनों आवश्यक हैं।

राजनीति में बदलाव केवल सत्ता परिवर्तन से नहीं आएगा

अक्सर चुनाव के बाद यह चर्चा होती है कि किस दल की जीत हुई, किसकी हार हुई और किसका राजनीतिक प्रभाव बढ़ा। लेकिन क्या लोकतंत्र का मूल्यांकन केवल इसी आधार पर होना चाहिए?

मेरे विचार से वास्तविक बदलाव तब आएगा, जब राजनीतिक दलों की प्राथमिकताएँ बदलेंगी। जब चुनावी घोषणापत्र केवल वादों का दस्तावेज नहीं, बल्कि जवाबदेही का आधार बनेंगे। जब जनप्रतिनिधि चुनाव के समय ही नहीं, बल्कि पूरे कार्यकाल में जनता के बीच रहेंगे। जब राजनीति में व्यक्तिगत लाभ से ऊपर सार्वजनिक हित को स्थान मिलेगा।

हमें ऐसी राजनीतिक संस्कृति विकसित करनी होगी, जिसमें नेता की लोकप्रियता से अधिक उसके काम का मूल्यांकन हो। चुनाव जीतना उपलब्धि हो सकती है, लेकिन जनता की समस्याओं का समाधान करना ही सच्ची सफलता है।

अब जनता को भी अपनी भूमिका समझनी होगी

लोकतंत्र केवल नेताओं और राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी नहीं है। इसमें जनता की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। मतदाता को जाति, धर्म, भावनात्मक नारों और तात्कालिक प्रलोभनों से ऊपर उठकर अपने विवेक का इस्तेमाल करना चाहिए।

हमें ऐसे प्रतिनिधियों का चुनाव करना चाहिए, जो क्षेत्र की समस्याओं को समझते हों, जनता के प्रति जवाबदेह हों और विकास के लिए ईमानदारी से काम करने की क्षमता रखते हों।

साथ ही, नागरिकों को भी अपने अधिकारों के साथ कर्तव्यों का निर्वहन करना चाहिए। केवल सरकार से अपेक्षा करने के बजाय समाज में शिक्षा, स्वच्छता, सामाजिक सद्भाव और जनजागरूकता के लिए अपनी भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी।

अंततः सवाल यही है—क्या राजनीति जनता के लिए बदलेगी?

समय बदलता है, पीढ़ियाँ बदलती हैं, राजनीतिक दल बदलते हैं और सत्ता के समीकरण भी बदलते रहते हैं। लेकिन यदि आम आदमी की समस्याएँ वर्षों तक वैसी ही बनी रहें, तो बदलाव का दावा अधूरा ही रहेगा।

आज देश को ऐसी राजनीति की आवश्यकता है, जो सत्ता के अहंकार से नहीं, सेवा के संस्कार से संचालित हो। ऐसी राजनीति, जिसमें विरोधी को दुश्मन नहीं, लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धी समझा जाए। ऐसी राजनीति, जिसमें वादों से अधिक काम, प्रचार से अधिक परिणाम और व्यक्तिगत स्वार्थ से अधिक राष्ट्रीय हित को महत्व मिले।

मेरे विचार से राजनीति की सबसे बड़ी सफलता यह नहीं कि कोई दल कितने वर्षों तक सत्ता में रहता है, बल्कि यह है कि उसके शासन में आम नागरिक का जीवन कितना बेहतर होता है।

आखिरकार, लोकतंत्र में कुर्सी स्थायी नहीं होती, जनता सर्वोपरि होती है। इसलिए सत्ता में बैठे प्रत्येक व्यक्ति को यह याद रखना चाहिए कि जनता ने उसे शासन करने का अधिकार अवश्य दिया है, लेकिन उस अधिकार के साथ सेवा, संवेदनशीलता और जवाबदेही का दायित्व भी सौंपा है।

चेहरे बदलने से इतिहास नहीं बदलता, इतिहास तब बदलता है जब सत्ता का चरित्र बदलता है। और राजनीति का वास्तविक परिवर्तन उसी दिन शुरू होगा, जिस दिन सत्ता का केंद्र नेता नहीं, बल्कि आम नागरिक बन जाएगा।

उक्त विश्लेषण लायंस क्लब इंटरनेशनल, डिस्ट्रिक्ट 322ई,जोन 41 के जोन चेयरपर्सन सह डिस्ट्रिक्ट चेयरपर्सन एवं भारत विकास परिषद् , रक्सौल के सेवा संयोजक सह मीडिया प्रभारी सह सामाजिक कार्यकर्ता बिमल सर्राफ ने प्रेस से साझा किया।