क्या 10वें साल में टूटेगी शराबबंदी की दीवार? बिहार की राजनीति में फिर गरमाई बहस

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अप्रैल 2016 में बिहार की राजनीति ने एक ऐतिहासिक फैसला देखा था। मुख्यमंत्री Nitish Kumar के नेतृत्व में राज्य सरकार ने पूर्ण शराबबंदी लागू कर दी थी। विधानसभा में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित हुआ और इसे सामाजिक क्रांति का नाम दिया गया। उस वक्त महागठबंधन की सरकार थी, लेकिन विपक्ष में बैठी Bharatiya Janata Party ने भी खुलकर समर्थन किया था। लगभग सभी दलों ने एक सुर में इस कानून का समर्थन करते हुए इसे महिलाओं और समाज के हित में बड़ा कदम बताया था।

लेकिन अब, शराबबंदी के दसवें साल में प्रवेश करते ही सियासी गलियारों में नई चर्चा तेज हो गई है। सवाल उठ रहा है—क्या बिहार में शराबबंदी कानून की समीक्षा होगी? क्या यह कानून अपने मौजूदा स्वरूप में जारी रहेगा या इसमें बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा?

कैसे लागू हुआ था कानून?

बिहार में पूर्ण शराबबंदी लागू करने का निर्णय 5 अप्रैल 2016 से प्रभावी हुआ था। इसके तहत राज्य में शराब की बिक्री, खरीद और सेवन पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया गया। सरकार का दावा था कि इससे घरेलू हिंसा में कमी आएगी, गरीब परिवारों की आर्थिक स्थिति सुधरेगी और अपराध पर अंकुश लगेगा।

शुरुआती दौर में महिलाओं ने इस फैसले का जोरदार स्वागत किया। कई गांवों में महिलाओं ने जश्न मनाया और इसे सामाजिक सुधार की दिशा में बड़ा कदम बताया। सरकार ने इसे अपनी बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश किया।

बदलती सियासत, बदलते सुर

समय के साथ हालात बदले। शराबबंदी कानून के उल्लंघन के हजारों मामले सामने आए। जेलों में बंद कैदियों की संख्या बढ़ी, अदालतों पर बोझ बढ़ा और पुलिस प्रशासन पर भी दबाव आया। कई बार जहरीली शराब से मौत की घटनाओं ने भी सरकार को कटघरे में खड़ा किया।

इन्हीं घटनाओं के बाद राजनीतिक दलों के सुर बदलने लगे। पहले जो दल एकजुट थे, अब उनके भीतर से ही समीक्षा की मांग उठने लगी। विपक्ष ने इसे “कागजी कानून” करार दिया, तो सत्ता पक्ष के कुछ नेताओं ने भी यह कहना शुरू कर दिया कि कानून की समीक्षा होनी चाहिए।

अब चर्चा इसलिए और तेज हो गई है क्योंकि एनडीए के अंदर से भी आवाजें उठ रही हैं। कुछ नेताओं का मानना है कि कानून के क्रियान्वयन में खामियां हैं और इसमें व्यवहारिक सुधार की जरूरत है।

आर्थिक पहलू भी बना मुद्दा

शराबबंदी के बाद राज्य को राजस्व में भारी नुकसान हुआ। शराब से मिलने वाला टैक्स राज्य की आय का बड़ा स्रोत था। सरकार ने दावा किया कि सामाजिक लाभ आर्थिक नुकसान से कहीं ज्यादा है, लेकिन आलोचकों का कहना है कि इससे समानांतर अवैध कारोबार को बढ़ावा मिला।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले विधानसभा चुनावों से पहले यह मुद्दा फिर से गरमा सकता है। यदि कानून में ढील या संशोधन की बात आगे बढ़ती है, तो इसका सीधा असर वोट बैंक की राजनीति पर पड़ेगा।

जनता क्या चाहती है?

ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी बड़ी संख्या में महिलाएं शराबबंदी के समर्थन में खड़ी हैं। उनका कहना है कि कानून से परिवारों में शांति आई है। वहीं युवाओं और व्यवसायिक वर्ग के कुछ लोग मानते हैं कि पूर्ण प्रतिबंध के बजाय सख्त नियंत्रण वाली नीति अपनाई जानी चाहिए।

सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि शराबबंदी का उद्देश्य सही था, लेकिन क्रियान्वयन में पारदर्शिता और सख्ती की जरूरत है। वे सुझाव देते हैं कि कानून को पूरी तरह खत्म करने के बजाय इसे व्यावहारिक बनाया जाए।

क्या कहती है सरकार? 

राज्य सरकार की ओर से अभी तक शराबबंदी हटाने का कोई आधिकारिक संकेत नहीं दिया गया है। मुख्यमंत्री Nitish Kumar कई बार सार्वजनिक मंच से कह चुके हैं कि शराबबंदी सामाजिक सुधार का हिस्सा है और इसे वापस लेने का सवाल नहीं उठता। हालांकि, समय-समय पर कानून में संशोधन जरूर किए गए हैं, ताकि निर्दोष लोगों को राहत मिल सके।

एनडीए के भीतर उठ रही आवाजों को लेकर सरकार सतर्क है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यदि दबाव बढ़ता है तो सरकार समीक्षा समिति बना सकती है, लेकिन पूर्ण प्रतिबंध हटाने जैसा कदम फिलहाल आसान नहीं दिखता।

आगे क्या?

शराबबंदी का मुद्दा अब केवल सामाजिक नहीं, बल्कि पूरी तरह राजनीतिक हो चुका है। दसवें साल में प्रवेश के साथ ही यह बहस फिर तेज हो गई है कि क्या कानून में बदलाव होगा या सरकार अपने पुराने रुख पर कायम रहेगी।

एक ओर महिलाएं और सामाजिक संगठन इसे बनाए रखने की मांग कर रहे हैं, तो दूसरी ओर राजनीतिक दल और कुछ आर्थिक विशेषज्ञ व्यावहारिक सुधार की बात कर रहे हैं। ऐसे में आने वाले महीनों में बिहार की राजनीति में यह मुद्दा केंद्र में रहने वाला है।

अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि क्या सरकार समीक्षा की घोषणा करती है या फिर शराबबंदी की दीवार और मजबूत की जाती है। फिलहाल इतना तय है कि 2016 में जिस सर्वसम्मति से यह कानून लागू हुआ था, वही एकता अब दिखाई नहीं दे रही है।

बिहार की सियासत में शराबबंदी एक बार फिर बड़ा चुनावी मुद्दा बनती नजर आ रही है—और आने वाला समय तय करेगा कि 10वें साल में यह कानून और सख्त होगा या इतिहास का हिस्सा बन जाएगा।