बिहार में पंचायत चुनाव 2026 की तारीखों का भले ही अभी औपचारिक ऐलान नहीं हुआ हो, लेकिन चुनावी सरगर्मी तेज़ हो चुकी है। इस बार का पंचायत चुनाव कई मायनों में खास होने वाला है। सबसे बड़ा बदलाव आरक्षण चक्र को लेकर है, जिसकी वजह से 2021 में सामान्य यानी अनारक्षित सीट से चुनाव जीतने वाले कई मुखिया 2026 में दोबारा चुनाव नहीं लड़ पाएंगे। इस बदलाव का सीधा असर मौजूदा जनप्रतिनिधियों की राजनीतिक किस्मत पर पड़ने वाला है।
2021 पंचायत चुनाव की तस्वीर
पिछले पंचायत चुनाव यानी वर्ष 2021 में बिहार में मुखिया के कुल 8,072 पद थे। इनमें से 5,268 पद अनारक्षित थे। लेकिन इन अनारक्षित पदों में भी महिलाओं के लिए विशेष आरक्षण लागू था।
इन 5,268 अनारक्षित मुखिया पदों में से 2,483 पद महिलाओं के लिए आरक्षित थे। यानी नाम भले ही अनारक्षित हो, लेकिन उन पर केवल महिलाएं ही चुनाव लड़ सकती थीं।
इसके अलावा,
पिछड़ा वर्ग के लिए कुल 1,357 मुखिया पद थे, जिनमें से 543 पद पिछड़ा वर्ग की महिलाओं के लिए आरक्षित थे।
अनुसूचित जाति (SC) के लिए कुल 1,338 पद आरक्षित थे, जिनमें से 539 पद अनुसूचित जाति की महिलाओं के लिए थे।
अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए कुल 91 मुखिया पद थे, जिनमें से 20 पद महिलाओं के लिए आरक्षित थे।
इस तरह 2021 के पंचायत चुनाव में कुल मिलाकर 3,585 मुखिया पद महिलाओं के लिए आरक्षित थे। महिला आरक्षण की यह संख्या बिहार के पंचायत राज व्यवस्था में महिलाओं की मजबूत भागीदारी को दर्शाती है।
2026 में क्यों बदलेगी चुनावी तस्वीर?
पंचायत चुनाव में आरक्षण का एक निश्चित चक्र होता है। नियम के अनुसार, हर दो पंचायत चुनाव के बाद आरक्षण का चक्र बदलता है।
2016 और 2021 के पंचायत चुनाव एक ही आरक्षण चक्र के तहत कराए गए थे। यही कारण है कि इन दोनों चुनावों में कई पंचायतों में आरक्षण की स्थिति समान रही। लेकिन 2026 में आरक्षण का चक्र पूरी तरह बदल जाएगा।
इस बदलाव का मतलब साफ है—
जो सीट 2021 में अनारक्षित थी, वह 2026 में आरक्षित हो सकती है।
जो सीट अनुसूचित जाति या पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षित थी, वह अब सामान्य हो सकती है।
महिलाओं के लिए आरक्षित सीटें बदलेंगी और कई पंचायतों में पहली बार महिला आरक्षण लागू हो सकता है।
कई मौजूदा मुखिया नहीं लड़ पाएंगे चुनाव
आरक्षण चक्र बदलने का सबसे बड़ा असर मौजूदा मुखियाओं पर पड़ेगा।
मान लीजिए, किसी पंचायत में 2021 में मुखिया का पद सामान्य वर्ग के लिए था और उस सीट से कोई पुरुष मुखिया चुना गया। अगर 2026 में वही सीट पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति या महिला के लिए आरक्षित हो जाती है, तो मौजूदा मुखिया उस सीट से चुनाव नहीं लड़ पाएगा।
यही वजह है कि 2026 के पंचायत चुनाव में जनरल सीट से जीते कई मुखिया चुनावी मैदान से बाहर हो सकते हैं। ऐसे जनप्रतिनिधियों के सामने या तो राजनीति छोड़ने की मजबूरी होगी या फिर किसी दूसरी पंचायत में जाकर अपनी किस्मत आजमाने की कोशिश करनी होगी।
जनसंख्या के आधार पर होगा SC-ST आरक्षण
अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षण जनसंख्या अनुपात के आधार पर तय किया जाएगा।
जिस प्रखंड में जिस पंचायत में SC या ST आबादी अधिक होगी, वहां मुखिया पद के लिए उसी वर्ग का आरक्षण तय किया जाएगा। यह प्रक्रिया पूरी तरह गणितीय और संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार होगी।
हालांकि, एक अहम शर्त यह भी है कि सभी श्रेणियों को मिलाकर आरक्षण 50 प्रतिशत से अधिक नहीं होगा।
इसके साथ ही हर श्रेणी—चाहे वह सामान्य हो, पिछड़ा वर्ग हो, अनुसूचित जाति हो या अनुसूचित जनजाति—हर कोटि में महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण अनिवार्य रहेगा।
प्रखंड स्तर पर तय होगा मुखिया आरक्षण
मुखिया पद का आरक्षण किसी एक पंचायत की आबादी के आधार पर नहीं, बल्कि प्रखंड की सभी पंचायतों की संयुक्त जनसंख्या के आधार पर तय किया जाएगा।
इसका उद्देश्य यह है कि पूरे प्रखंड में आरक्षण का संतुलन बना रहे और किसी एक वर्ग को लगातार लाभ या नुकसान न हो।
राजनीतिक हलचल तेज
आरक्षण चक्र बदलने की चर्चा के साथ ही पंचायत स्तर पर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। कई मौजूदा मुखिया अपने भविष्य को लेकर असमंजस में हैं। वहीं, नए चेहरे और वे लोग जो अब तक आरक्षण की वजह से चुनाव नहीं लड़ पा रहे थे, उन्हें 2026 में मौका मिलने की उम्मीद है।
कुल मिलाकर, पंचायत चुनाव 2026 सिर्फ एक चुनाव नहीं, बल्कि सत्ता और प्रतिनिधित्व की नई संरचना का संकेत है। बदलता आरक्षण चक्र न केवल राजनीतिक समीकरण बदलेगा, बल्कि पंचायतों की नेतृत्व व्यवस्था में भी बड़ा बदलाव लेकर आएगा। आने वाले महीनों में जैसे-जैसे चुनाव की तारीखें नजदीक आएंगी, पंचायत राजनीति की यह तस्वीर और साफ होती जाएगी।








