लोक आस्था का महापर्व छठ 17 नवंबर 2023 से शुरू हो चुका है. आज यानी 18 नवंबर (शनिवार) को छठ पूजा का दूसरा दिन है. आज खरना है. आज के दिन व्रती सूर्योदय से सूर्यास्त तक निर्जला व्रत रखते हैं. उसके बाद शाम की पूजा करके प्रसाद ग्रहण करते हैं. फिर पूरे परिवार के सदस्य उस प्रसाद को खाते हैं. खरना के दिन उपवास रखकर तन और मन को शुद्ध और मजबूत बनाया जाता है, ताकि अगले 36 घंटे का निर्जला व्रत रखा जा सके. 36 घंटे तक निर्जला उपवास के कारण यह व्रत कठिन व्रतों में से एक माना जाता है.
कौन हैं छठी मईया
सूर्यदेव तो इस प्रकृति के ऊर्जा स्रोत हैं. छठी मैया देवी कात्यायनी हैं. यह सूर्यदेव की बहन हैं. नवरात्र में भी हम देवी कात्यायनी की पूजा षष्ठी को करते हैं, मतलत नवरात्र के छठे दिन. सनातन हिंदू धर्म में जन्म के छठे दिन भी देवी कात्यायनी की ही पूजा होती है. इन्हें संतान प्राप्ति के लिए भी प्रसन्न किया जाता है. संतान के चिरंजीवी, स्वस्थ और अच्छे जीवन के लिए देवी कात्यायनी को प्रसन्न किया जाता है. छठी मैया यही हैं. इसलिए, यह समझना मुश्किल नहीं. शेष, छठ में सूर्यदेव की पूजा तो घाट पर होती है, खरना पूजा पहले छठी मैया के लिए ही होती है.
छठ पर्व की कथाएं
कर्ण ने शुरू की सूर्य देव की पूजा
मान्यता के अनुसार महापर्व छठ की शुरुआत महाभारत काल में हुई थी. इस पूजा की शुरुआत सूर्य पुत्र कर्ण के द्वारा हुई थी. कर्ण ने सूर्य देव की पूजा शुरू की. कथाओं के अनुसार कर्ण भगवान सूर्य के परम भक्त थे. वह हर दिन घंटों तक कमर जितने पानी में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य दिया करते थे. उनके महान योद्धा बनने के पीछे सूर्य की कृपा थी. आज के समय में भी छठ में अर्घ्य देने की यही पद्धति प्रचलित है.
राम-सीता ने की सूर्य की पूजा
एक पौराणिक लोक कथा के अनुसार जब भगवान श्रीराम लंका पर विजय प्राप्त कर लौटे तो राम राज्य की स्थापना की जा रही थी. कार्तिक शुक्ल षष्ठी के दिन ही राम राज्य की स्थापना हो रही थी, उस दिन भगवान राम और माता सीता ने उपवास किया और सूर्य देव की आराधना की थी. सप्तमी को सूर्योदय के समय पुनः अनुष्ठान कर उन्होंने सूर्यदेव से आशीर्वाद प्राप्त किया था ऐसा माना जाता है, कि तब से लेकर आज तक यही परंपरा चली आ रही है.










