मोतिहारी। जिले के मलाही थाना क्षेत्र से पुलिस की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े करने वाला एक मामला सामने आया है। आरोप है कि पुलिस ने वारंट किसी दूसरे व्यक्ति के नाम पर होने के बावजूद एक निर्दोष व्यक्ति को गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया। हैरानी की बात यह है कि परिजन लगातार साक्ष्य और पहचान संबंधी दस्तावेज दिखाकर पुलिस को समझाते रहे, लेकिन उनकी बात नहीं सुनी गई।
जानकारी के अनुसार, उत्पाद थाना मोतिहारी के टीआर संख्या 2127/22 से रमेश महतो, पिता रतन महतो, ग्राम ममरखा मलाही के नाम से वारंट जारी था। लेकिन मलाही थाना पुलिस ने शनिवार को ममरखा भैया टोला पंचायत, वार्ड संख्या 01 निवासी रमेश कुमार, पिता रामबच्चन महतो को गिरफ्तार कर लिया।
परिजनों का आरोप है कि गिरफ्तारी के तुरंत बाद से ही वे स्थानीय जनप्रतिनिधियों के साथ मलाही थाना पहुंचे और थानाध्यक्ष को स्पष्ट रूप से बताया कि गिरफ्तार व्यक्ति वही वारंटी नहीं है जिसकी तलाश की जा रही है। उन्होंने दोनों व्यक्तियों के पिता का नाम, पता और पंचायत अलग-अलग होने के दस्तावेज भी प्रस्तुत किए, लेकिन पुलिस ने किसी भी साक्ष्य पर ध्यान नहीं दिया।
आरोप है कि पुलिस ने बिना पर्याप्त सत्यापन किए रमेश कुमार को न्यायिक हिरासत में भेज दिया। पुलिस की इस कथित लापरवाही के कारण एक निर्दोष व्यक्ति को दो दिनों तक जेल में रहना पड़ा। इस घटना के बाद स्थानीय लोगों और परिजनों में भारी नाराजगी देखी जा रही है।
मामला जब न्यायालय पहुंचा तो कोर्ट ने उपलब्ध तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए संबंधित व्यक्ति को पर्सनल बॉन्ड पर रिहा करने का निर्देश दिया। इसके बाद रमेश कुमार जेल से बाहर आ सके। हालांकि, तब तक उन्हें पुलिस की कथित गलती का खामियाजा दो दिन जेल में रहकर भुगतना पड़ा।
इस पूरे घटनाक्रम ने पुलिस की जांच प्रक्रिया और पहचान सत्यापन प्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। लोगों का कहना है कि यदि वारंट पर दर्ज व्यक्ति का नाम, पिता का नाम और पता अलग था, तो गिरफ्तारी से पहले पूरी जांच क्यों नहीं की गई। परिजनों का आरोप है कि यदि पुलिस समय रहते दस्तावेजों की सही तरीके से जांच कर लेती, तो एक निर्दोष व्यक्ति को जेल नहीं जाना पड़ता।
फिलहाल इस मामले की चर्चा पूरे इलाके में हो रही है और लोग जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। वहीं, पुलिस की ओर से इस मामले में आधिकारिक प्रतिक्रिया का इंतजार है। यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह मामला न केवल गंभीर प्रशासनिक लापरवाही का उदाहरण होगा, बल्कि आम नागरिकों के अधिकारों और न्यायिक प्रक्रिया पर भी बड़ा सवाल खड़ा करेगा।










